शाम-ए-ज़िंदगी

एक शाम है ज़िन्दगी जो कटती ही नहीं
सुबह के बेइंतहा ख़्वाहिशों के नज़ारे लिए
फ़लक़ में जड़े टिमटिमाते यादों के सितारे लिए

ये सुर्ख़ ,ज़र्द , नीली, सुनहरी गहरी शाम
हज़ारों रंगों में नहाई एक चलती तस्वीर
ढलती सी,थमी  सी लम्हों में पिघलती नक़्क़ाशी

जिसकी यादों में है जलता हुआ आफ़ताब भी
जिसकी आँखों में है मद्धम सा महताब भी
यादों में,फ़रयादों में,डूबी दहकती, महकती शाम

इस शाम का कभी उजला सवेरा भी था
इस शाम कि ही आने वाली काली रात भी है
ये ठहरी हुई, गुज़रती हुई,एक हसीन याद भी है 

चिड़ियों के घर लौटने वाली चहचहाहट भी इसकी
जंगल के नपे तुले क़दमों कि आहट भी इसकी
थके दरख़्त के पीले पत्तों की सरसराहट भी है

गुज़िश्ता और आइन्दा कल के सपनों के तले
सैंकड़ों छूटे काम और टूटे ख्वाबों को लिए
जाने कैसी शाम है ये ज़िंदगी जो कटती ही नहीं  

Comments

Popular posts from this blog

uncomfortable questions! (if you are done with celebrating I-Day, then read this!)

Marine Musings- A short story

leaf and life!